Feziya khan

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धीरे धीरे से भाग --- 3




भाग - ३


सुबह से रात रात से दिन कब हो जाती दीप्ती को पता ही नही चलता था दीप्ती मन ही मन बोली क्या ज़िन्दगी दी है तूने मुझे ऊपर वाले पूरी लाइफ ही बदल दी मेरी तो ये जो हिटलर बैठी हैं न मेरी ज़िंदगी में ये सब उनका ही किया धरा है जब देखो तब एक ही बात पर इनकी घड़ी तो जैसे अटक ही गई है,,,,,,,,

काम सीख ले नही तो सुसराल जा कर मुझे ही बाते सुनवाएगी माँ ने कुछ सिखाया है की नही कुछ ढंग से आता ही नहीं है लड़कियों को सब आना चाहिए खाना , साफ सफाई, सिलाई कड़ाई, बुनाई,,,,,,,

दीप्ती तो बस मन मसोड़ कर रह जाती और कुछ तो नही रह गया देख लो एक बार कही कुछ छूट तो नही गया वो भी सीखा दो क्या पता उसके लिए न सुनना पड़ जाए मुझे,,,,,,,

सिलाई प्रशिक्षण में तो एडमिशन तो करवा दिया है उसकी भी करवा देना,,,,,

क्या ज़िंदगी है ये यार सुबह छः बजे ही उठा देती है अपने साथ काम करवाती है फिर टाइम हो जाता है सैंटर का फिर वहां भागों पांच बजे आओ खाना खाओ शाम से फिर किचिन में,,,

बस ऐसे ही मेरी ज़िंदगी की वाट लगा रखी है दीप्ती की बिस्तर की तो शकल ही न देखो अगर गलती से नजर भी आ जाऊं तो शुरू मां के डायलॉग "टूट गई कमर" जो पड गई जो घेर लिया बिस्तर का पीछा एक काम किया नही की पसर गई,,,,,

आज कल की लड़कियों से तो कुछ बोलो ही न काम की एक काम में ही दम निकल जाता है तुम्हारी उम्र में तो हम पूरे घर का काम अकेले करते थे हमे तो पता ही नहीं होता था की दर्द कैसा होता था,,,,,,,

दीप्ती तकिए में मुंह को छुपा कर बोलती तुम्हारा जमाना और तुम दोनो ही महान है!

दीप्ती के पापा भी कई बार बोलते क्या जब देखो मेरी बेटी के पीछे पड़ी रहती हो, क्यों कोई मेरी बेटी को सुनाएगा सुसराल में

दीप्ती भी अपना रुआसा सा मुंह ले कर पापा के गले लगते हुए बोलती देखो ना पापा मम्मी जब देखो तब मेरे पीछे पड़ी रहती है,,,,,,

अच्छा पापा की चमची अभी बताती हूं तुझे, दीप्ती और जोर से पापा को पकड़ लेती तो पापा हंसते हुए बोलते अब कोई मेरी बेटी को कुछ नही बोलेगा,,,,,,,

दीप्ती के दिन ऐसे ही ख़ट्ठी मीठी ज़िन्दगी के साथ बीत रहे थे उसकी दोस्तो से भी मुलाकात नही होती थी अब, अब तो दीप्ती छुट्टियों को कोसने लग गयी थी इतने दिन की छुट्टियां पड़ती ही क्यों है यार,,,,,

उसका मन करता की कल ही स्कूल खुल जाए और वो फुर से उड़ जाऊं एक आजाद पंछी की तरह मस्त गगन में उड़ती फिरू तितलियों के जैसी स्कूल लाइफ कितनी अच्छी होती है न मम्मी के अनगिनत सीक्रेट टॉर्चर से भी तो बचाती हैं,,,,,

जैसे तैसे दिन बीत रहे थे जल्द ही दीप्ती के जाने का भी दिन आ गया जब दीप्ती और मम्मी को नरेश अंकल के साथ घूमने देहरादून जाना था ,,,,,,

सब ट्रेन में बैठ गए थे दीप्ती ने भी भाग कर खिड़की वाली सीट पकड़ ली, उनकी ट्रेन ने थोड़ी ही देर में स्टेशन को छोड़ती हुई आगे तेजी से बढ़ती हुई निकल गई,,,,,,,,

बहुत अच्छा लग रहा था हरे भरे लहलहाते खेत आसमान को छूते लहराते हुए पेड़ ठंडी ठंडी महकती हवा मन एक अजीब सी फीलिंग से भरा हुआ जाता है,,,,,

पता नही क्यों देहरादून की आवो हवा उससे से कुछ और ही कह रही थी पर क्या ये मुझे खुद ही पता नही ,,,,,,,

ट्रेन में मस्ती मजाक के साथ सफर काट रहा था बहुत  मजा आया इस सफर में,,,,,

सुबह के छः बजे थे ज़ब उसकी नीद खुली तो बाहर का नजारा देख कर उसका तो मन बड़ी तेजी से उछल पड़ा,,,,,,,

चारो तरफ पहाड़ की ऊंची चोटियां उसके बादलों से लूक्का छुपी खेलता हुआ सूरज चाचा अपनी किरणे बिखेर रहे थे
सुबह का सुंदर नजारा देख कर वो कुछ तस्वीरे लेने लगी!

मम्मी ने कहा अब जल्दी से ये सब रखो और तैयार हो जाओ नाश्ता कर लो भी जब तक हमारा स्टेशन आ जायेगा जब समान भी समेटना है मम्मी आंखो को बड़ा करते हुए बोली ये जो इतना प्रसंग फेला रखा है न इन सब को जल्दी से समेटो समझी,,,,,,

दीप्ती भी थोड़ा नाक सिकोड़ कर बोली क्या क्या फेलाया है मैने मां आप को तो बस मुझ पर गुस्सा करने का बहाना चाहिए,,,,

मम्मी की नजरो ने जैसे ही दीप्ती को घूरा वो उठकर जाते हुए बोली जा तो रही हूं,,,,,,,

स्टेशन से उतर कर वो सब अंकल के साथ एक घर में पहुंचे घर बड़ा तो नही पर चार कमरे एक बड़ा सा हॉल ,,,,,,

हॉल के पास ही छोटी सी फुलवाड़ी बनी हुई थी उसमे सफेद लाल रंग के गुलाब लगे हुए थे जो उस जगह की खूबसूरती को बड़ा रही थी,,,,,,,

सब ने उन सब का दिल खोल कर स्वागत किया मेरी नज़रे चारो तरह उस घर को देख रही थीं की हम यहां क्यों आए है होटल में भी तो जा सकते थे पता नही कौन है  ये लोग कुछ अजीब लग रहा है इनके घर में ,,,,,,,,,

मम्मी की तरफ दीप्ती ने मुंह बिगड़ते हुए देखा तो वो घूरते हुए देखने लगी तो वो चुप चाप बैठ गई कर भी क्या सकते थे अपनी सुनने वाला कौन है यहां अब ये सोचते हुए उसने ऊपर की तरफ देखा तो ऊपर एक लड़का अपनी तिरछी नजरों से उसे ही देख रहा था दोनों की नज़ारे जैसे ही एक दूसरे से टकराई तो दीप्ती नर्वस हो कर गई और इधर उधर देखने लग गई ,,,,,,,,,,



कौन है ये लोग जहाँ दीप्ती को लेकर आया गया है क्या ये वही है जहाँ से उसका रिश्ता होने वाला है पर रिश्ते से पहले ही यहाँ क्यों आई है क्या मकसद था नरेश का उसे लाने का जानने के लिए जुड़े रहे मेरे साथ,,,

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4 Comments

madhura

16-Aug-2023 06:26 PM

Good

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hema mohril

16-Aug-2023 05:05 PM

Good

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Babita patel

16-Aug-2023 04:41 PM

Nice

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